100% नहीं है डाबर का रियल जूस! FSSAI ने कोर्ट में दी रिपोर्ट, कंपनी पर उपभोक्ताओं को गुमराह करने का आरोप
नई दिल्ली: डाबर के “रियल फ्रूट जूस” के 100% होने के दावे पर अब सवाल उठ गए हैं। भारत की शीर्ष खाद्य नियामक संस्था, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर कर यह स्पष्ट किया है कि डाबर का ‘100% फ्रूट जूस’ का दावा ग़लत और भ्रामक है। इस मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला?
डाबर कंपनी के “रियल” ब्रांड के जूस पर “100% फ्रूट जूस” लिखा गया है। FSSAI ने कोर्ट में कहा कि यह दावा उपभोक्ताओं को धोखा देने वाला है क्योंकि इन उत्पादों में पानी मिलाया जाता है और जूस को कंसन्ट्रेट (गाढ़े रस) से तैयार किया जाता है।
FSSAI ने बताया कि वर्तमान लेबलिंग नियमों के तहत ‘100%’ जैसे दावे अनुमोदित नहीं हैं। खासकर जब उत्पाद में अतिरिक्त सामग्री जैसे पानी हो, तो इसे 100% कहना अवैज्ञानिक और भ्रामक हो जाता है। नियामक संस्था ने कहा कि “100%” जैसा दावा खाद्य सुरक्षा और मानक (विज्ञापन और दावे) विनियम, 2018 के तहत अनुचित और गैर-कानूनी है।
FSSAI पहले ही कर चुका है चेतावनी जारी
FSSAI ने जून 2024 में एक अधिसूचना जारी कर सभी फूड कंपनियों को निर्देश दिया था कि वे अपने जूस उत्पादों पर ‘100% फ्रूट जूस’ जैसा दावा हटाएं। संस्था का मानना है कि ऐसा दावा करने से उपभोक्ताओं को भ्रम होता है और वे सोचते हैं कि उत्पाद पूरी तरह से प्राकृतिक और बिना मिलावट का है, जबकि वास्तविकता कुछ और होती है।
डाबर का पक्ष
डाबर ने कोर्ट में अपने बचाव में कहा कि उसके जूस कंसन्ट्रेट और पानी मिलाकर बनाए जाते हैं, जो एक सामान्य और मान्य प्रक्रिया है। कंपनी का दावा है कि इस प्रक्रिया में जूस की मूल संरचना और गुणवत्ता बनी रहती है और यह FSSAI के सभी मानकों का पालन करती है। इसलिए वह ‘100% फ्रूट जूस’ का लेबल उचित मानती है।
मुद्दा उपभोक्ता विश्वास का
यह मामला सिर्फ एक कंपनी की मार्केटिंग रणनीति का नहीं है, बल्कि उपभोक्ताओं के भरोसे और स्वास्थ्य से भी जुड़ा है। अगर कोर्ट FSSAI के तर्कों को सही मानता है तो इससे न सिर्फ डाबर, बल्कि अन्य कंपनियों की ब्रांडिंग और लेबलिंग पर भी असर पड़ सकता है।
क्या हो सकते हैं इसके प्रभाव?
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उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ेगी कि ‘100%’ का मतलब हमेशा 100% नहीं होता।
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कंपनियों को अपनी मार्केटिंग रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
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नियमों में और सख्ती आ सकती है, जिससे खाने-पीने के उत्पादों पर दावे पहले से अधिक पारदर्शी बन सकें।
